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इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए चार्ज नहीं करनी पड़ेगी बैटरी, देसी तकनीक से बना रही ये दिग्गज कंपनी, 8 साल तक चलेगी

Indian Oil Corporation making Domestic Metals Battery for Electric Vehicles

अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों (Electric Vehicles) के ऐसी बैटरी (Battery) का इस्तेमाल होगा जो कि बिना चार्ज किये ही लम्बे समय तक चलेगी. बता दें पब्लिक सेक्टर की दिग्गज कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (Indian Oil Corporation) इलेक्ट्रिक गाड़ियों में लगने वाली ऐसी बैटरी का बना रही है, जिसमें देसी मेटल्स का इस्तेमाल होगा. इससे इलेक्ट्रिक गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाली लिथियम आयन वाली बैटरी पर निर्भरता घटेगी, यह बात IOC के चेयरमैन संजय सिंह ने कही.


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संजय सिंह ने कहा कि इन मेटल-एयर बैटरियों में इस्तेमाल होनेवाले आयरन, जिंक और एल्युमिनियम जैसे मेटल्स के ऑक्सिडाइजेशन से एनर्जी पैदा होगी. कंपनी जो बैटरी बना रही है, उन्हें रिचार्ज नहीं किया जा सकेगा. बैटरियों में फिर से पावर लाने के लिए इनके प्लेट्स बदलने होंगे. IOC का दावा है कि इन बैटरियों का इस्तेमाल करने पर चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की भी जरूरत नहीं पड़ेगी.


संजय सिंह ने कहा कि ‘अगर किसी ग्राहक को जरूरतभर का पेट्रोल आसानी से मिलता है तो वह इस बात में नहीं उलझता कि पेट्रोल कैसे तैयार किया जाता है. इसी तरह अगर वह किसी एनर्जी स्टेशन पर जाता है और उसकी बैटरी के मेटल प्लेट्स 3 मिनट में बदल दिए जाते हैं तो वह इधर-उधर की बातें नहीं सोचेगा’.


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संजय सिंह ने कहा कि ‘आयरन, जिंक और एल्युमिनियम वाली मेटल-एयर बैटरी में हाई एनर्जी डेंसिटी होती है. एक लिथियम आइन बैटरी से गाड़ी 300 किलोमीटर की दूरी तय कर सकती है तो मेटल बैटरी लगी गाड़ी एक बार में 500 किलोमीटर तक जा सकती है’. इस तकनीक की लागत कारोबार के आकार पर निर्भर करेगी. यह बात सही है कि इस तकनीक में बैटरी चार्ज करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन इसमें प्लेट्स बदलने के बिजनेस के लिए नए कारोबारी मॉडल की दरकार होगी.


संजय सिंह ने कहा कि ‘अगर हम देशभर में इलेक्ट्रिक गाड़ियों को बढ़ावा देने जा रहे हैं तो हमें कच्चे माल के लिए विदेश पर आश्रित नहीं रहना चाहिए’. मेटल वाली बैटरी में प्रॉडक्शन और रिसाइकलिंग दोनों ही काम स्थानीय स्तर पर किए जा सकते हैं. इससे बैटरी के आयात संबंधी चिंता दूर होगी जो पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर विकल्प है.


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IOC के डायरेक्टर रिसर्च ऐंड डिवेलपमेंट डॉ. एसएसवी रामकुमार ने कहा कि ‘इसमें एयर कैथोड सहित बाकी बैटरी बची रहती है. इन्हें कम से कम 8 साल तक बदलने की जरूरत नहीं पड़ती और उसके बाद एयर कैथोड को पूरी तरह रिसाइकल किया जा सकता है’. बता दें कि मेटल ऑक्साइड की एक खास बात यह है कि इसे फिर से मेटल में बदला जा सकता है, इसलिए इसका प्रॉसेस रिसाइकल वाला होगा.


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