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सिद्धांतो के पक्के थे लोहिया, बेल मिलने के बाद भी जेल के बाहर पिता को नहीं दी श्रद्धांजलि, 12 हजार रुपए के चलते गई थी जान

आज समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया (Ram Manohar Lohia) की पुण्य तिथि है. 23 मार्च 1910 को यूपी के अकबरपुर में जन्मे राममनोहर लोहिया वैश्य परिवार से ताल्लुक रखते थे.भारत की आजादी में समाजवादी नेता के तौर पर राममनोहर लोहिया ने अपना अहम योगदान दिया. वह कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. उन्होंने अपनी अलग समाजवादी विचारधारा के चलते कांग्रेस से रास्ते अलग किए थे. लोहिया ताउम्र सिद्धांतो पर जिए और मरना पसन्द किया लेकिन जीवन के प्रति बनाए अपने नियमों से समझौता नहीं किया..


9 अगस्त 1942 को जब गांधी जी और कांग्रेस के अन्य नेता गिरफ्तार कर लिए गए तब महान विचारक एवं स्वतंत्रता सेनानी राम मनोहर लोहिया ने भूमिगत रहकर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को पूरे देश में फैलाया. 20 मई 1944 को उन्हें बॉम्बे (मुंबई) में गिरफ्तार कर लाहौर किले की एक अंधेरी कोठरी में रखा गया जहां 14 वर्ष पहले शहीद भगत सिंह को फांसी दी गई थी.


लाहौर के वकील जीवनलाल कपूर द्वारा ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ की दरखास्त लगाने पर लोहिया जी और जयप्रकाश नारायण को स्टेट प्रिजनर घोषित किया गया. 1945 में लोहिया जी को लाहौर से आगरा जेल भेज दिया गया. द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने पर गांधी जी और कांग्रेस के कई नेताओं को छोड़ दिया गया लेकिन लोहिया और जयप्रकाश नारायण अब भी जेल में ही थे. इस बीच लोहिया के पिता हीरालाल की मृत्यु हो गई. मित्रों को जैसे ही इस बात का पता चला, उन्होंने प्रयास किया कि सरकार लोहिया जी को पैरोल पर छोड़ दें. मित्रों की कोशिश सफल हुई और सरकार लोहिया जी को पैरोल पर छोड़ने के लिए राजी हो गई.


लोहिया जी जेल में पिता की मृत्यु के दुख से उबरने का प्रयत्न कर रहे थे. मिलने आए एक मित्र से उन्हें पैरोल पर रिहाई की खबर मिली. लोहिया जी बोले, ‘रिहाई किसकी और क्यों?’ मित्र बोला, ‘स्वर्गीय पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए तुम्हें पैरोल पर छोड़ने को सरकार राजी हो गई है’. लोहिया जी बोले, ‘कर्तव्य से पलायन को श्रद्धांजलि का नाम मत दो. मुझे किसी का उपकार नहीं चाहिए. मेरे पिता सारी उम्र आदर्शों के लिए लड़ते रहे. इन आदर्शों को ठुकरा कर, कर्तव्य से पलायन कर मैं उन्हें श्रद्धांजलि कैसे दे सकूंगा? मैं अपने आदर्शों का पालन करके जेल में रहते हुए यहीं से पिताजी को श्रद्धांजलि अर्पित करूंगा. पिता की मौत की आड़ में सरकार से सहानुभूति लेना मुझे मंजूर नहीं है.’


आखिरी वक्त तक अपने उसूलों के पक्के राम मनोहर लोहिया ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. सिर्फ 12 हजार रुपए का इंतजाम हो जाता तो लोहिया की जान बच सकती थी. लोहिया चाहते तो एक चुटकी में इतने पैसों को इंतजाम हो सकता था, लेकिन उन्होंने अपने उसूलों के साथ समझौता करना गवारा नहीं समझा.


राम मनोहर लोहिया का निधन एक ऑपरेशन के बाद फैले इंफेक्शन की वजह से हुआ. अगर उनका इलाज किसी बेहतर अस्पताल में होता तो उनकी जान बच सकती थी. विदेश के किसी अस्पताल में इलाज करवाने के लिए उन्हें 12 हजार रुपए की जरूरत थी. लोहिया चाहते तो इतने पैसों का इंतजाम आसानी से हो सकता था. लेकिन उन्होंने इन पैसों के इंतजाम के लिए सख्त पाबंदिया लगा रखी थी. सिर्फ 12 हजार रुपयों के चलते देश ने अपना सबसे बड़ा नेता खो दिया.


अस्पताल की बदइंतजामी के चलते गई जान

1967 की बात है. राम मनोहर लोहिया को बढ़े हुए प्रोस्टेट ग्लैंड की बीमारी थी. उस वक्त राम मनोहर लोहिया सांसद थे. कुछ राज्यों में उनकी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की सरकार भी थी. लोकसभा में पार्टी के दो दर्जन से ज्यादा सदस्य थे. लोहिया को बढ़े हुए प्रोस्टेट ग्लैंड के विदेश के किसी अच्छे अस्पताल में ऑपरेशन के लिए 12 हजार रुपयों की जरूरत थी. इतनी रकम आसानी से इकट्ठा हो सकती थी, लेकिन लोहिया ने अपने पार्टी के सदस्यों को सख्त ताकीद दे रखी थी कि पैसों का इंतजाम उन्हीं राज्यों से हो, जहां उनकी पार्टी की सरकार नहीं है.


डॉ. लोहिया ने बंबई में अपनी सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े एक मजदूर नेता से पैसों का इंतजाम करने को कहा था. लोहिया ने कहा था कि वो मजदूरों से चंदा इकट्टा कर 12 हजार रुपए जमा करें, लेकिन मजदूर नेता वक्त पर इतनी रकम इकट्ठा नहीं कर पाए. राम मनोहर लोहिया अपने ऑपरेशन के लिए जर्मनी जाना चाहते थे. वहां के अस्पताल में उनका ऑपरेशन होना था. एक यूनिवर्सिटी ने उनका जर्मनी आने-जाने का इंतजाम कर दिया था. वहां उन्हें एक भाषण भी देना था.


लेकिन इस बीच उनकी बीमारी बढ़ गई. लोहिया को दिल्ली के वेलिंगटन नर्सिंग होम में भर्ती करवाया गया. लोहिया के प्रोस्टेट ग्लैंड का ऑपरेशन हुआ. आज के वक्त में ये बिल्कुल मामूली सा ऑपरेशन है. लेकिन कहा जाता है कि अस्पताल की बदइंतजामी की वजह से ऑपरेशन के बाद लोहिया को इंफेक्शन हो गया. इसके बाद लोहिया की बिगड़ी हालत को संभाला नहीं जा सका और 12 अक्टूबर 1967 को उन्होंने आखिरी सांस ली. जिस वेलिंगटन नर्सिंग होम में उनका ऑपरेशन हुआ था, बाद में उसका नाम बदलकर राम मनोहर लोहिया अस्पताल कर दिया गया.


लोहिया के ऑपरेशन में हुई लापरवाही का विवाद लंबे वक्त तक चला. इतना तय था कि अगर लोहिया का इलाज विदेश के किसी अच्छे अस्पताल में हुई होती तो उनकी जान बच सकती थी. सिर्फ 57 साल की उम्र में उनका निधन हो गया और देश ने अपना महान नेता खो दिया.


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